Monday, January 25, 2010

अगर ज़िन्दगी के पहलूँ को सही करना चाहा , तो क्या मै कातिल हुआ
मै भी जुदाई के गम को अकेले सहता रहा , तो मुझे क्या हासिल हुआ

आज भी याद है हमे वो पल जब ,
तू हमारी आवाज़ सुन सपनो में दौड़ कर आती
हम तेरे संग अपना अकेलापन दूर करते और तू सुबह होते ही चली जाती
लेकिन ये तब की बात थी जब तुने हमे अपना हमसफ़र चुना था
हमारी हर अनकही अनसुनी आवाज़ को तुने बहुत ध्यान से सुना था

ब अगर तू मेरी आवाज़ ध्यान से सुन नहीं सकती , तो क्या मै कातिल हुआ
मै भी जुदाई के गम को अकेले सहता रहा , तो मुझे क्या हासिल हुआ
तेरे साथ लम्बा सफ़र तय करना था , हमारी खुदा से यही गुज़ारिश थी
तेरे साथ लम्बा सफ़र तय हो न सका , इसमें वक़्त की कोई गहरी साजिश थी
वक़्त ने हम पर पीछे से वार किया और हम बचा ना सके तुझे
हमे गुनेगार करार देते हुए , तुने कातिल बना दिया मुझे

अगर मै वक़्त से लड़कर तुझे बचा ना सका , तो क्या मै कातिल हुआ
मै भी जुदाई के गम को अकेले सहता रहा , तो मुझे क्या हासिल हुआ
आज ज़िन्दगी की कचेहरी मैं खड़े , बेबसी की बेड़ियाँ पेहेन दिल में शर्म बहुत है
तेरी अदालत में तुझे छोड़ देने की सजा और कुछ नहीं सिर्फ सजाए मौत है
जनता हूँ इस जनम में ये कहानी मै अधूरी छोड़े चले जा रहा हूँ
साथ बुने सपनो की ज़ंजीर मैं एक पल में तोड़े चले जा रहा हूँ
अब तो मै भी मानता हूँ की मै तेरा कातिल था
क्या हुआ अगर हम जीते जी मिल ना सके लेकिन खुश हूँ की
मेरा हमदम मेरे जनाज़े में शामिल था
मेरा हमदम मेरे जनाज़े में शामिल था
मेरा हमदम मेरे जनाज़े में शामिल था

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